इस विधि को मुख्यतः दो भागो में बाटा गया है सारभूत विधि एवं प्रक्रियात्मक विधि सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 प्रक्रियात्मक विधि का ही एक रूप है किसी स्वतंत्र राजनैतिक समाज में वह सिद्धान्त अथवा नियम जिनके अनुसार अधिष्ठायी विधि का उल्लंघन होने या उसकी आशंका होने पर न्यायालय द्वारा किसी सिविल वाद के सम्बन्ध में जो प्रक्रिया अपनायी जाती है वो सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आती है
वहीं सिविल प्रक्रिया संहिता को दो भागो में विभाजित किया गया है पहला धारा 1 से 158 तक जिसमें उच्च न्यायालयों को संशोधन का अधिकार प्राप्त नहीं है दूसरा प्रथम अनुसूची के आदेश I से LI में दिये गये नियम तथा संहिता के अन्त में दी गयी अन्य अनुसूचियाॅ जिनमें राज्यों के अतिरिक्त विभिन्न उच्च न्यायालय भी अपने क्षेत्राधिकार के भीतर आवश्यक संशोधन कर सकते है।
वहीं सिविल प्रक्रिया संहिता को दो भागो में विभाजित किया गया है पहला धारा 1 से 158 तक जिसमें उच्च न्यायालयों को संशोधन का अधिकार प्राप्त नहीं है दूसरा प्रथम अनुसूची के आदेश I से LI में दिये गये नियम तथा संहिता के अन्त में दी गयी अन्य अनुसूचियाॅ जिनमें राज्यों के अतिरिक्त विभिन्न उच्च न्यायालय भी अपने क्षेत्राधिकार के भीतर आवश्यक संशोधन कर सकते है।
अभिवचन
अभिवचन का अर्थ वाद पत्र या अभिवाद पत्र है किसी भी वाद का योजन केवल वाद पत्र के प्रस्तुत करने पर ही हो सकता है वहीं न्यायालय द्वारा इस पर समन विपक्षी को जारी किये जाने पर वह उतर में प्रतिवाद पत्र देता है। यह दोनों अभिवचन के भाग हैं। इनमें व्यक्ति केवल उन तात्विक तथ्यों को संक्षिप्त रूप से देता है जिनमें वह निर्भर करता है तथा साक्ष्य जिससे यह तथ्य सिद्ध किये जाने हैं को सम्मिलित नहीं कर सकता। उक्त सिद्धान्त वाद पत्र व प्रतिवाद पत्र दोनों में लागू होते है
यदि वाद पत्र में दिये अभिकथनों को इन्कार किया गया है तो प्रत्याख्यान विनिर्दिष्ट होना चाहिए। यदि प्रत्याख्यान स्पष्ट व विनिर्दिष्ट नहीं है तो वाद पत्र में अभिकथित तथ्य प्रतिवादी के विरुद्ध स्वीकृत माने जा सकते हैं।
पक्षकार
वाद केवल विधिक व्यक्ति ही ला सकता है और केवल विधिक व्यक्ति के विरुद्ध योजित किया जा सकता है अर्थात वाद में पक्षकार विधिक व्यक्ति ही होने चाहिए। जहाॅ अनेकानेक व्यक्ति वाद योजित करना चाहते है अथवा अनेकानेक व्यक्तियों के विरुद्ध वादी को एक ही वाद हेतुक के सम्बन्ध में अनुतोष प्राप्त करना हो वाद प्रतिनिधि वाद के रूप में भी लाया जा सकता है
न्यायालय यदि चाहे तो पक्षकारों मे से किसी वादी या प्रतिवादी का नाम काटकर किसी अन्य व्यक्ति को जिसको पक्षकार बनाया जाना हो जोड़ने के लिए आदेश कर सकता है
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