हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 जम्मू कश्मीर राज्य के सिवाय उन हिन्दू पर भी लागू होगा जो उक्त राज्य क्षेत्र के बाहर हों व हिन्दू धर्म के किसी भी रूप या विकास के अनुसार जिसके अन्तर्गत, वीरशैव, लिंगायत अथवा प्रार्थनासमाज या आर्यसमाज के अनुयायी भी आते है वो धर्मत: हिन्दू हो
ऐसे किसी भी व्यक्ति जो धर्मत: जैन, बौद्ध या सिक्ख हो
ऐसे किसी भी अन्य व्यक्ति जो उन राज्यक्षेत्रों में जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है अधिवसित हो और धर्मत: मुस्लिम क्रिश्चियन पारसी या यहूदी न हो जब तक कि यह साबित न कर दिया जाए कि यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो ऐसा कोई भी व्यक्ति एतस्मिन उपबन्धित किसी भी बात के बारे में हिन्दू विधि या उस विधि के भागरूप किसी रूढि या प्रथा द्वारा शासित न होता।
हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के धारा 2 उपधारा 1 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसी जनजाति के सदस्यों को जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड 25 के अर्थ के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति हो लागू न होगी जब तक कि केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट न कर दे ।
हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत जब तक यह अपेक्षित न हो -
रूढ़ि और प्रथा पद ऐसे किसी भी नियम का संज्ञान कराते हैं जिसने दीर्घकाल तक निरंतर और एकरूपता से अनुपालित किए जाने के कारण किसी स्थानीय क्षेत्र जनजाति समुदाय समूह या कुटुबं के हिन्दुओं में विधि का बल अभिप्राप्त कर लिया हो
परंतु यह तब जब कि वह नियम निश्चित हो और अयुक्तियुक्त या लोकनीति के विरूद्ध न हो तथा
ऐसे नियम की दशा में जो एक कुटुंब को ही लागू हो उसकी निरंतरता उस कुटुंब द्वारा बंद न कर दी गई हो
3 (ग) पूर्ण रक्त और अर्थ रक्त कोई भी दो व्यक्ति एक दूसरे से पूर्ण रक्त से संबंधित तब कहे जाते हैं जब कि वे एक ही पूर्वज से एक ही पत्नी द्वारा अवजनित हों और अर्ध रक्त से तब जब कि वह एक ही पूर्वज से किन्तु भिन्न पत्नियों द्वारा अवजनित हों
(घ) एकोदर रक्त दो व्यक्ति एक से एकोदर रक्त से संबंधित तब कहे जाते हैं जब कि वे एक ही पूर्वजा से किन्तु भिन्न पतियों द्वारा अवजनित हों
स्पष्टीकरण खंड ग और खंड घ में पूर्वज के अंतर्गत पिता और पूर्वजा के अंर्तगत माता आती है
च (i) सपिंड नातेदारी जब निर्देश किसी व्यक्ति के प्रति हो तो माता के माध्यम से उसकी परंपरा में तीसरी पीढी तक और पिता के माध्यम से उसकी परंपरा में पांचवी पीढी तक गिनी जाती है हर एक दशा में वंश परंपरा सम्पृक्त व्यक्ति से जिसे पहले पीढी का गिना जाएगा
(ii) दो व्यक्ति एक दूसरे के सपिंड तब कहे जाते है जबकि या तो एक उनमेें से दूसरे का सपिंड नातेदारी की सीमाओं के भीतर पूर्वपुरुष हो या जब कि उनका ऐसा कोई एक ही पारंपरिक पूर्व पुरुष हो जो निर्देश उनमें से जिस किसी के भी प्रति हो उससे सपिंड नातेदारी की सीमाओं के भीतर हो

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