वाद में विचारण के लिए मुख्य सुनवाई होती है जिसमें पक्षकारों द्वारा लाये गये साक्षीगण की मौखिक साक्ष्य अभिलिखित की जाती है तथा बहस सुनी जाती है सुनवाई के लिए साक्ष्य देने व बहस का प्रथम अधिकार वादी का होता है और तब प्रतिवादी साक्ष्य देता है।
यदि वाद में समस्त तथ्य स्वीकृत हों और केवल विधिक बिन्दुओं जिन्हें प्रतिवादी ने उठाया है पर ही विवाद हो तो प्रतिवादी बहस प्रारम्भ कर सकता है और वादी उतर देता है। मौखिक साक्ष्य के लिए साक्षी की मुख्य परीक्षा विपक्षी द्वारा उसकी प्रति परीक्षा व वादी द्वारा पुन: परीक्षा के लिए सिद्धान्त भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 101 से 110 के अनुसार लागू होते है
किसी तथ्य विशेष के लिए न्यायालय यह आदेश दे सकती है कि उसे मौखिक साक्ष्य के बजाय शपथ पत्र द्वारा सिद्ध किया जाय किन्तु प्रतिवादी द्वारा सदभाविक प्रार्थना इस आशय पर देने पर कि वह शपथकर्ता से प्रतिपरीक्षा करना चाहता है प्रति परीक्षा के लिए न्यायालय अनुमति दे सकती है।
निर्णय व डिक्री क्या होता है
निर्णय का अर्थ है न्यायाधीश का वह लिखित औपचारिक कथ जिसमें वह अपने निष्कर्ष व आदेश के समर्थन में दिये कारण देता है। हालांकि निर्णय आदेश व डिक्री तीनों ही न्यायालय द्वारा दिये गये विनिश्चय की ओर इंगित करते हैं तथापि यह भिन्न हैं। क्योंकि निर्णय में निष्कर्ष के कारण देना आवश्यक है जबकि डिक्री अथवा आदेश में आवश्यक नहीं । दूसरी ओर डिक्री पक्षकारों के मध्य उनके अधिकारों का अंतिम रूप से निश्चायक अवधरण करती है जबकि आदेश में ऐसा होना अनिवार्य नहीं ।
डिक्री जो कि निर्णय का अनुवर्ती औपचारिक आदेश होता है में वाद की संख्या पक्षकारों के नाम व पते वाद में माॅगा गया अनुतोष और न्यायालय द्वारा दिया गया अनुतोष लिखा जाता है डिक्री निर्णय के सुनाये जाने के पन्द्रह दिन के भीतर बना ली जाती है क्योंकि डिक्री में दिये गये आदेश का ही पक्षकार निष्पादन या कार्यान्वयन कराता है।
यदि वाद में समस्त तथ्य स्वीकृत हों और केवल विधिक बिन्दुओं जिन्हें प्रतिवादी ने उठाया है पर ही विवाद हो तो प्रतिवादी बहस प्रारम्भ कर सकता है और वादी उतर देता है। मौखिक साक्ष्य के लिए साक्षी की मुख्य परीक्षा विपक्षी द्वारा उसकी प्रति परीक्षा व वादी द्वारा पुन: परीक्षा के लिए सिद्धान्त भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 101 से 110 के अनुसार लागू होते है
किसी तथ्य विशेष के लिए न्यायालय यह आदेश दे सकती है कि उसे मौखिक साक्ष्य के बजाय शपथ पत्र द्वारा सिद्ध किया जाय किन्तु प्रतिवादी द्वारा सदभाविक प्रार्थना इस आशय पर देने पर कि वह शपथकर्ता से प्रतिपरीक्षा करना चाहता है प्रति परीक्षा के लिए न्यायालय अनुमति दे सकती है।
निर्णय व डिक्री क्या होता है
निर्णय का अर्थ है न्यायाधीश का वह लिखित औपचारिक कथ जिसमें वह अपने निष्कर्ष व आदेश के समर्थन में दिये कारण देता है। हालांकि निर्णय आदेश व डिक्री तीनों ही न्यायालय द्वारा दिये गये विनिश्चय की ओर इंगित करते हैं तथापि यह भिन्न हैं। क्योंकि निर्णय में निष्कर्ष के कारण देना आवश्यक है जबकि डिक्री अथवा आदेश में आवश्यक नहीं । दूसरी ओर डिक्री पक्षकारों के मध्य उनके अधिकारों का अंतिम रूप से निश्चायक अवधरण करती है जबकि आदेश में ऐसा होना अनिवार्य नहीं ।
डिक्री जो कि निर्णय का अनुवर्ती औपचारिक आदेश होता है में वाद की संख्या पक्षकारों के नाम व पते वाद में माॅगा गया अनुतोष और न्यायालय द्वारा दिया गया अनुतोष लिखा जाता है डिक्री निर्णय के सुनाये जाने के पन्द्रह दिन के भीतर बना ली जाती है क्योंकि डिक्री में दिये गये आदेश का ही पक्षकार निष्पादन या कार्यान्वयन कराता है।
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