Sunday, September 29, 2019

क्या अपराध और अपकृत्य एक दूसरे के पूरक है ?

अपराध और अपकृत्य में अधिकारों का अतिक्रमण होता है वहीं दोनो असमानता की पूष्टि की जा सकती

अपकृत्य विधि अपराध विधि से पुरानी है हेनरी मेंन के अनुसार आदिकालीन समुदायों की दांडिक विधि अपराधों की विधि नहीं अपकृत्यों की विधि थी

अपकृत्य का आधार किसी व्यक्ति के हितों का अतिक्रमण है जबकि अपराध समाज के हितो के अंतर्गत आता है कोई कार्य या लोप समाज के हितों के विरूद्ध भी होता है और किसी व्यक्ति के अधिकार का भी अतिक्रमण करता है। ऐसा कार्य या लोप अपकृत्य भी होता है और अपराध भी यहा पर अगर कोई किसी को मार देता है तो वह अपराध भी है और अपकृत्य भी क्योंकि व्यक्ति के शारीरिक हितों का अतिक्रमण होता है और दूसरी ओर सामाजिक हित का भी अतिक्रमण होता है।

अपकृत्य में व्यक्ति के स्वंय का अतिक्रमण होता है तो वह वाद दायर करता है वहीं अपराध के मामले में समाज के हितों का अतिक्रमण होता है तो राज्य एक पक्षकार बन जाता है

आपराधिक अतिक्रमण में दांडिक न्यायालयों में तय किये जाते है वहीं अपकृत्य के मामले सिविल में तय किये जाते है। हालांकि कुछ मामलों में दोनो एक ही न्यायालय में तय किया जाता है

अपकृत्य विधि का उद्देश्य हानि की पूर्ति करना परन्तु दांडिक विधि का उद्देश्य समाज में विधि और व्यवस्था बनाये रखना है।

अपकृत्य के मामले में नुकसान की रकम हानि होने वाले व्यक्ति को दी जाती है जबकि आपराधिक मामलो में जुर्माना राज्य-कोष में जमा किया जाता है

साक्ष्य अधिनियम सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार के मामलों पर लागू होता है। अधिनियम में सबूत के बारे में दोनों प्रकार की विधियों में कोई अन्तर नहीं किया गया है फिर भी परिणामों को ध्यान में रखकर न्यायालय आपराधिक मामलों में निर्णय तभी देता है जब केस युक्यिुक्त सन्देह से परे साबित हो जाता है। यदि सन्देह रह जाता है तो उसका लाभ अभियुक्त को ही दिया जाता है। 

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